ह़ज़रते अली मुश्किल कुशा और सोलह सय्यिदों का रोज़ा
कुछ जगह औरतें ह़ज़रते अली मुश्किल कुशा का रोज़ा रखती हैं,तो रोज़ा हो या कोई और इबादत, सब अल्लाह के लिए ही होती हैं, हां अगर यह नियत कर ली जाए कि इसका सवाब ह़ज़रते अली की रुहे पाक को पहुंचे तो यह अच्छी बात है,लेकिन इस रोज़े में इफ़्तार आधी रात में करती हैं,और घर का दरवाज़ा खोल कर दुआ मांगती हैं,यह सब ख़ुराफ़ात और वाहियात और वहमपरस्ती की बातें हैं,
📕📚फतावा रज़विया शरीफ़ जिल्द 4 सफह 660
यूं ही 16 रजब को सोलह सय्यदों का रोज़ा रखा जाता है,उसमें जो कहानी पढ़ी जाती है वह गढ़ी हुई है
📕📚ग़लतफ़हमियाँ और उनकी इस्लाह सफह 73
रोट बोट का रोज़ा
कुछ जगहों पर रजब की 17 तारीख़ को रोज़ा रखते हैं,और उसे रोट बोट का रोज़ा कहते हैं,खास तौर से इस दिन रोज़ा रखने का शरीयते इस्लामिया में कोई हुक्म नहीं है, नफ़्ल रोज़ा साल में ममनूअ दिनों को छोड़कर कभी भी रखा जा सकता है, 16 रजब को रोज़े के लिए मख़सूस करके उसे रोट बोट का रोज़ा कहना, और मख़सूस वज़न की छोटी-बड़ी दो रोटियां और बोटियाँ पकाना,छोटी फातिहा पढ़ने वाले को और बड़ी रोजेदार को खिलाना बे अस्ल और गढ़ी हुई बातें हैं
📕📚ग़लतफ़हमियाँ और उनकी इस्लाह 72
_______________
🌹والله تعالیٰ اعلم بالصواب🌹


COMMENTS